मो.रिज़वान

वाराणसी : जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर खड़े देश में जीवन की जद्दोजहद लगातार जटिल होती जा रही है। बढ़ती जनसंख्या घटते संसाधन विषमता की खाई को बढ़ा रहे हैं। वहीं सरकारी योजनाएं धूल-धूसरित साबित हो रही हैं। हमारे देश में आबादी उस मुकाम पर पहुँच चुकी है कि उसे आगे बढ़ने से रोकने के लिए त्वरित उपाय नहीं किये गये तो देश एक गहरे संकट में फंस जाएगा और विकास का लक्ष्य सिर्फ एक सपना बनकर रह जाएगा। छोटा परिवार सुखी परिवार, हम दो हमारे दो या दो के बाद कभी नहीं के सरकारी नारे तो बहुत लगाये गए किन्तु हकीकत यह है कि दुनिया में भारत आज भी सबसे अधिक आबादी वाले देशों में दूसरे स्थान पर है। इतनी बड़ी जनसंख्या को खाद्य पदार्थ मुहैया कराने को प्रतिवर्ष 54 लाख टन से अधिक का खाद्यान्न उत्पादन होना चाहिए जबकि औसतन केवल 40 लाख टन प्रतिवर्ष की दर से ही अनाज की पैदावार हो रही है। जनसंख्या वृद्धि दर को रोकने के कोई उपाय नहीं किये गए तो स्थिति और विस्फोटक हो सकती है। देश में जनसंख्या वृद्धि का मूल कारण अशिक्षा एवं गरीबी है। जिसके चलते बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की समस्या के साथ ही आर्थिक व सामाजिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही है। राजनीतिक लाभ के चलते सरकारें भी जनसंख्या नियंत्रण पर कोई ठोस कदम नहीं उठा रही।
जनसख्या वृद्धि के कारण पर्यावरण व अर्थव्यवस्था पर भी इसका सीधा असर हो रहा है पिछले कई वर्षो से विस्तृत अध्ययन हुए हैं, जिसमें हमारी अब तक की कई मान्यताएं, धारणाए ध्वस्त हुई हैं जो यह इंगित करती हैं कि जनसंख्या की समस्या के हल के लिए हमें इससे जुडी हुई भ्रांतियों को दूर कर, स्वेच्छा से इस पर अमल करना होगा। तत्काल उपाय नहीं किये गए तो वर्ष 2040 तक हमारा देश दुनिया में सबसे अधिक जनसख्या वाला देश हो जाएगा। जबकि अभी चीन सबसे अधिक आबादी वाला देश है और हमारे देश का स्थान दूसरे नम्बर पर है। सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाय तो जिस रफ्तार से जनसख्या बढ रही है, उससे वह 2018 के अंत तक 1 अरब 30 करोड से अधिक हो जाएगी। 2011 की जनगणना को देखा जाय तो उत्तर भारत के चार राज्यों- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में जनसंख्या वृद्धि अन्य राज्यों की अपेक्षा तेजी से बढ़ रही है। इससे स्पष्ट होता है कि इन राज्यो में परिवार नियोजन कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार व शिक्षा में जबरदस्त कमी है। वर्ष 1981 में जन्म दर 34.9 प्रतिशत थी जो वर्ष 1991 में कम होकर 32.7 प्रतिशत हो गई। वहीं 60 से अधिक आयु के लोगों की संख्या में बृद्धि हो गई। 14 वर्ष के लड़कों की सख्या वर्ष 1981 में 39.5 प्रतिशत थी जो वर्ष 1991 में घटकर 37.2 प्रतिशत हो गई । भारत एक ऐसा विकासशील देश है जिसने राष्ट्रीय आधार पर परिवार नियोजन कार्यक्रम को लागू किया। वर्ष 1976 में राष्ट्रीय जनसंख्या नीति निर्धारित होने के बाद इस क्षेत्र में कुछ प्रगति जरूर हुई। 1977 के बाद सत्ता में आई सरकारों ने परिवार नियोजन की दिशा मे कई कदम उठाए परन्तु परिणाम उत्साहवर्धक नहीं रहे। यही कारण है कि अधिक जनसंख्या के चलते बेरोजगारी और कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या में भी निरन्तर बृद्धि होती जा रही है। बेरोजगार युवक-युवतियों का नौकरी की तलाश में शहर की ओर पलायन करने के चलते शहरों में आवास, पानी और बिजली की स्थिति दिन-प्रतिदिन जटिल होती जा रही है। जनसंख्या वृद्धि का असर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि सुविधाओ पर भी पड़ रहा है । स्कूलों में छात्रों को एडमिशन के लिए पापड़ बेलने पड़ रहे हैं। अस्पतालों में मरीजों की भीड़, बसों व ट्रेनों में जगह मिलना मुश्किल होता जा रहा है। हमारे देश की ज्यादातर आबादी गावों में निवास करती है। वहां स्वास्थ्य और चिकित्सा की व्यवस्था सुदृढ करने की जरूरत है। ग्रामीण क्षेत्रो में तैनात चिकित्सक शहरों या कस्बों में निजी प्रैक्टिस में मशगूल हैं। इसका मुख्य कारण राज्य सरकार है क्योंकि गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ के रहने के लिए न तो आवास है और न ही पानी-बिजली की व्यवस्था। आजादी के बाद जो भी आर्थिक विकास हुआ वो मात्र शहरी क्षेत्रों में उसके परिणामस्वरूप कुल आय में कृषि क्षेत्र का हिस्सा तो कम होता गया परन्तु उस पर निर्भर जनसंख्या का प्रतिशत नहीं घटा है। जिसके चलते कृषि क्षेत्र के लोग अन्य क्षेत्रों की तुलना में गरीब होते गये। कृषि पर आश्रित लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने में ऊर्जा, खेती की जमीन और जगह की भूमिका उतनी नहीं है जितनी जनसंख्या की गुणवता की है। भूमि की सीमित मात्रा के बावजूद सिंचाई, खाद, बीज इत्यादि की गुणवत्ता को बढाकर उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। कृषि का क्षेत्रफल सीमित है बावजूद जनसख्या वृद्धि सबसे अधिक विकासशील देशों में है, इसलिए जब तक जनसंख्या नियंत्रण को नहीं किया जाता तब तक न तो गरीबी मिटाई जा सकती है और न ही हम विकास कर सकते हैं। परन्तु अफसोस की बात है कि झूठी लोकप्रियता के लिए अधिकतर राजनीतिक दल वितरणात्मक दृष्टि ही अपनाने पर जोर देते और विकास की समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते। जबकि साक्षरता के साथ ही साथ लोगों को परिवार नियोजन जैसे मुद्दों पर जागृत करने की आवश्यकता है जिससे जनसंख्या वृद्धि को रोका जा सके। रूढ़िवादी मान्यताओं के कारण हमारे देश में आज भी शिक्षित परिवारों के लोग वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए लड़के की चाहत में भ्रूण ह्त्या जैसे घिनौने कृत्य से बाज नहीं आते वहीं गरीब परिवारों में लोग लड़के की चाहत में संतानोत्पत्ति का क्रम जरी रखते है। दोनों ही परिस्थितियों में महिलाओं को एक बच्चा पैदा करने की मशीन से ज्यादा कुछ नहीं समझा जाता है। आवश्यकता है कि सरकारें अपने राजनीतिक फायदे से हटकर ऐसे कड़े कदम उठाये जिससे जनसंख्या विस्फोट को रोका जा सके। जब तक सरकारें कोई कडा निर्णय नहीं लेंगी तब तक परिवार नियोजन के मोर्चे पर सफलता प्राप्त नहीं हो सकती । चीन का उदाहरण हमारे सामने है जिसने सामाजिक सुरक्षा का कदम उठाकर इस समस्या का हल निकालने में सफलता पाई। दो से अधिक सन्तान वाले व्यक्ति को सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया जाना चाहिए चाहे वह कितना भी बड़ा व्यक्ति हो। लेकिन हकीकत यह है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में सरकारें इस प्रकार का कानून बनाने से हिचकती हैं। सभी राजनैतिक पार्टियां सोचती हैं कि जितनी जनसंख्या बढ़ेगी उतना ही हमारा वोट बैंक बढ़ेगा। पूर्व केन्द्रीय वित्त मंत्री पी चिदम्बरम ने कहा था कि दो संतान वाले करदाताओं को कर में विशेष छूट देने के बारे में सरकार विचार कर रही है। परन्तु पूर्व केंद्रीय मंत्री जब-तक इसे अमली जामा पहनाने का काम करते केंद्र से उनकी सरकार का पतन हो गया। परिवार नियोजन पर अमल करने वालों को सुविधाएं प्रदान करने के लिए निजी कपनियों और संस्थानों को प्रेरित किया जाना चाहिए। नौवीं पंचवर्षीय योजना में गर्भनिरोध की सभी अनुभूत जरूरतों को पूरा करने लक्ष्य रखते हुए सुझाव दिया गया था कि आवश्यक औषधियों, टीकों और उपयुक्त गुण के गर्भ निरोधको की पर्याप्त मात्रा में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। परन्तु हमारे देश में जो योजनाये बनती हैं वे अमली जामा पहनने के पूर्व ही दम तोड़ देती हैं यही हश्र नौवीं पंचवर्षीय योजना का भी हुआ। परिवार नियोजन को एक राष्ट्रीय कार्यक्रम घोषित करते हुए इसको सफल बनाने के लिए युद्धस्तर पर कार्य किए जाने की आवश्यकता है जिसके लिए एक जनांदोलन की आवश्यकता है और सभी राजनीतिक दलों, समाजसेवी सस्थाओं और सरकारी संगठनो की सक्रिय भागीदारी के बिना जनसंख्या वृद्धि को रोकना संभव नहीं है। इस कार्य में लोगों को इतना जागरूक किया जाय कि वे स्वेच्छा से छोटा परिवार की धारणा को अपना सकें। इस कार्य में महिलाओं को शिक्षित करते हुए आगे लाने की आवश्यकता है तभी इस दिशा मे किये गए प्रयास सार्थक परिणाम दे सकते हैं। परिवार नियोजन कार्यक्रम में नसबंदी की आवश्यकता के स्थान पर अन्तराल पद्धति को प्रोत्साहित किया जाय। जिसमे बालिकाओं की विवाह की आयु 21 वर्ष, आर्थिक विकास पर जोर देना, गैर सरकारी संगठनो की भूमिका सुनिश्चित करना, अच्छे किस्म के गर्भ-निरोधकों को उपलब्ध कराना, जन्म दर को मृत्यु दर की अपेक्षा कम किये जाना, प्रजनन दर को घटाना, महिलाओं की शिक्षा पर प्राथमिकता देना होगा। परिवार नियोजन न केवल परिवार कल्याण को सुदृढ़ बनाएगा अपितु सामाजिक समृद्धि तथा सुख-शांति को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होगा।

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