आप इतिहास भले ही ना बना पाएं लेकिन उसे मनचाहे ढंग से गढ़ कर परोस जरूर सकते हैं. सत्ता में रहते भारत की राजनीतिक पार्टियां अपनी विचारधारा के छाप-तिलक अमिट बनाए रखने की नीयत से ऐसी रणनीति पर अमल करती आई हैं. देश की शिक्षा-व्यवस्था अगर हलकान है तो उसकी एक बड़ी वजह यह भी है. इसी टेक पर मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नव-निर्वाचित कांग्रेसी सरकारें अपने अनूठे ‘विषहरण’ अभियान पर हैं. ये सरकारें पाठ्यपुस्तकों और स्कूली पाठ्यक्रम को पूर्वाग्रहों और पुनरुत्थानवादी हिन्दुत्व के रुझानों से मुक्त करने में लगी हैं. बहरहाल, जहां तक मामले को निपटाने का मामला है, इन तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की रफ्तार अलग-अलग है.

जान पड़ता है स्कूली पाठचर्या (कुरिकुलम) को ‘विषमुक्त’ बनाने की सबसे ज्यादा जल्दी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को है. उन्होंने सूबे के शिक्षामंत्री प्रेमसाइ सिंह टीकम से उन पाठ्यपुस्तकों से छुटकारा दिलाने के लिए कहा है जिन्हें तथ्य और सत्य की अनदेखी करते हुए बहुसंख्यकवादी हिन्दू विश्व-दृष्टि से लिखा गया है.

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस से जुड़े पूर्व पत्रकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के राजनीतिक सलाहकार विनोद वर्मा का कहना है ‘मुख्यमंत्री और उनकी टीम ने एक समिति बनाने के लिए देश भर के विशेषज्ञों से संपर्क साधना शुरू किया है. यह समिति पाठ्यपुस्तकों (टेक्स्ट बुक), पाठयक्रम (सिलेबस) और पाठ्यचर्या(कुरिकुलम) का पुनरावलोकन और समीक्षा करेगी.’ उन्होंने बताया ‘हम लोग एक ऐसी पाठ्यचर्या बनाना चाहते हैं जो पाठ को सिखाने के मामले में प्रोफेसर यशपाल समिति के सोच से मेल खाए. हम चाहते हैं, नई पीढ़ी पूर्वग्रहरहित इतिहास पढ़े. हम यह भी चाहते हैं कि छात्रों में वैज्ञानिक तेवर, तर्कबुद्धि तथा समावेशी जीवन-दृष्टि का विकास हो.’

वर्मा का कहना है कि पाठ्यपुस्तकों के भगवाकरण के अतिरिक्त रमन सिंह सरकार के 15 सालों के शासन में स्कूली कुरिकुलम में कई बड़ी गलती और विसंगतियां पैदा हो गई हैं. इन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है. मिसाल के लिए छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की तरफ से प्रकाशित 10वीं कक्षा के समाज विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में बताया गया है कि देश की आजादी के बाद ज्यादा तादाद में महिलाओं ने काम करना शुरू कर दिया, इस कारण बेरोजगारी बढ़ गई. किताब में लिखा गया है कि स्वतंत्रता से पहले, कम ही महिलाएं नौकरी करती थीं. लेकिन आज महिलाएं हर क्षेत्र में काम कर रही हैं, इससे पुरुषों में बेरोजगारी का अनुपात बढ़ गया है.’

भूपेश बघेल और विनोद वर्मा का कहना है कि आरएसएस से जुड़े विद्या भारती सरीखे निजी स्कूलों की अपनी निजी पाठ्यचर्या है. यह मामला बड़ा पेचीदा है और इससे निपटने के लिए कोई तरीका ढूंढ़ना होगा. ‘संस्कृति ज्ञान परीक्षा’ के अन्तर्गत पढ़ाई जाने वाली पाठ्य-सामग्री का एक हिस्सा बानगी के तौर पर नीचे दिया जा रहा है :

प्रश्न) किस मुगल शासक ने 1582 में राममंदिर का विध्वंस किया?

उत्तर) बाबर

प्रश्न ) साल 1582 से 1992 तक कितने रामभक्तों ने मंदिर की मुक्ति के लिए अपने जीवन का बलिदान किया ?

उत्तर ) 3,50,000

गांधी-नेहरू की भूमिका

जयपुर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शिक्षामंत्री गोविन्द सिंह दोस्तरा से महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सरीखे राष्ट्रनायकों की ‘भूमिका’ को बहाल करने के लिए कहा है. सो, मंत्री ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को एक स्टेटस रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा है. जिसमें जिक्र किया जाएगा कि वसुंधरा राजे के शासन के समय पाठ्यपुस्तक में बदलाव की कितनी और कौन सी कोशिशें हुईं. प्रसिद्ध शिक्षाविद् अनिल सदगोपाल का कहना है ‘शिक्षा राजनीतिक है, केंद्र में जब भी बीजेपी की सरकार बनती है, शिक्षा को एक खास विचारधारा की रंगत देने की कोशिश होती है. नतीजतन जब भी कांग्रेस, वामधारा या मध्यमार्गी पार्टियां सत्ता में आती हैं तो चीजों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिशें की जाती हैं.’ प्रोफेसर सदगोपाल केंद्र सरकार के सेंट्रल एडवायजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने कहा कि पाठ्यपुस्तकों में बार-बार बदलाव से विद्यार्थी बहुत परेशान होते और असमंजस में पड़ते हैं.

बीजेपी के शासन में रह चुके इन तीन राज्यों में शायद राजस्थान पुनरुत्थानवादी हिन्दुत्व का अजेंडा थोपने और मुस्लिम पहचान को मिटाने के ख्याल से ‘रचनात्मक छूट’ लेने के मामले में सबसे अव्वल साबित हुआ है. मिसाल के लिए, यहां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में पृथ्वीराज चौहान को एक ऐसा राजा बताया गया है जिसने ‘भारत पर आक्रमण करने वाले मोहम्मद गोरी को कई दफे हराया.’ साल 2017 के फरवरी में, सूबे के शिक्षामंत्री वसुदेव देवनानी ने एक प्रस्ताव का समर्थन किया था. प्रस्ताव ये था कि बच्चों को वैकल्पिक इतिहास-दृष्टि से शिक्षा दी जाए. शिक्षामंत्री का जोर एक खास तथ्य की तरफ था. उनका कहना था कि 1576 में हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप ने अकबर को हराया था ना कि अकबर ने महाराणा प्रताप को, जैसा कि इतिहास की किताबों में बताया जाता है. देवनानी ने कहा था ‘हम तो हमेशा से ही मानते आ रहे हैं कि महाराणा प्रताप को इतिहास में सही मुकाम नहीं दिया गया.’ यहां तक कि एक पाठ के निहायत सीधे-सादे शीर्षक ‘अजमेर की सैर’ को बदलकर ‘अजमेर की यात्रा’ कर दिया गया.

आठवीं क्लास की किताब में सतीप्रथा का महिमामंडन किया गया है. राजस्थान की एक पाठ्यपुस्तक में ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ को ‘सिंधु घाटी संस्कृति’ लिखा गया है. आर्यों को भारत का मूलवासी बताया गया है जबकि प्रसिद्ध इतिहासकारों का मानना है कि आर्य कहीं बाहर से चलकर भारत पहुंचे थे. साल 2016 की मई में वसुंधरा राजे सरकार ने आठवीं क्लास की पाठ्यपुस्तक से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का नाम हटा दिया. उस वक्त सूबे की कांग्रेस इकाई की अगुवाई कर रहे सचिन पायलट ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जताई और मीडिया से कहा था ‘इसके जरिए भगवाकरण को एक नए मुकाम तक पहुंचा दिया गया है. बीजेपी की विचारधारा का खोखलापन अब इस हद तक बढ़ आया है कि वह स्कूल की किताबों से देश के पहले प्रधानमंत्री का नाम तक हटाने पर उतर आई है. लेकिन उन्हें समझ लेना चाहिए कि इससे मुल्क के मन-मानस में दर्ज नेहरू की याद और उनके योगदान को नहीं मिटाया जा सकता.’ पायलट ने बताया है कि नई सरकार बस पहले की किताबों में दर्ज बातों को नए सिरे से वापस ला रही है ताकि गांधी और नेहरू को पाठ्यपुस्तकों में पर्याप्त स्थान मिल सके.

दोस्तरा ने बताया कि राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एसआइईआरटी) पाठ्यचर्या (कुरिकुलम) का पुनर्संयोजन (रि-स्ट्रक्चरिंग) कर रहा है और पाठ्यपुस्तकों का पुनरावलोकन इसी का हिस्सा है. उन्होंने कहा ‘हम लोग इस बात की भी जांच-परख कर रहे हैं कि एसआइईआरटी कैसे काम करता है. हम लोग विभिन्न बोर्ड और परिषद् में आरएसएस की हिमायत से नियुक्ति पाए अधिकारियों के मसले का भी पुनरावलोकन कर रहे हैं.’

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ लोकसभा चुनावों तक मामले में रफ्तार धीमी रखना चाहते हैं. उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव एस आर मोहंती से पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम के पुनरावलोकन की ‘बुनियाद’ तैयार करने और जून-जुलाई से शुरू होने वाले अकादमिक सत्र से बदलावों को लागू करने की बात कही है. मध्यप्रदेश के स्कूली शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी ने कहा है कि मामले में सुधार की जरूरत है ‘स्कूली पाठ्यचर्या में कुछ बड़ी विसंगतियां पैदा हो गई हैं और इन्हें सुधारने की जरूरत है.’ चौधरी ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान के शासन में स्कूली शिक्षा में ‘राजनीतिक प्रचार’ को जिस तरह जगह देने की कोशिश हुई उसे जानकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ है.’ चौधरी के मुताबिक, शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इतिहास को नए सिरे से लिखवाने के लिए ‘इतिहास पुनर्लेखन समिति’ का गठन किया था.

भोपाल निवासी स्कूल प्रशासक अहमद कमाल का कहना है ‘शिक्षक पसोपेस में हैं. पुरानी पाठ्यपुस्तक में जो बात कही गई थी, ठीक उसके उलट बात नई पाठ्यपुस्तक में बताई गई है. चूंकि हमारे कुछ बच्चे पुरानी और इस्तेमाल में आ चुकी किताबों के सहारे पढ़ते हैं, सो शिक्षकों को पाठ्यपुस्तक में हुए बदलाव को समझा पाने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.’ मामले की जानकारी रखने वाले भोपाल के कुछ सूत्रों का कहना है कि कमलनाथ सरकार पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रम से जुड़े राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसलों पर बहुत फूंक-फूंक कर कदम उठाना चाहती है. मिसाल के लिए साल 2011 के बाद से शिवराज सिंह चौहान के शासन में बच्चों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने के लिए स्कूली पाठ्यचर्या में ‘गीता-सार’ पढाया जाने लगा. उर्दू माध्यम के सरकारी स्कूल की किताबों में गीता पर एक पाठ शामिल किया गया. मुस्लिम और ईसाई धर्म के प्रतिनिधियों के विरोध के बाद शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने बाइबिल, कुरान तथा गुरु ग्रंथसाहिब से भी पाठों को शामिल किया. मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबी सूत्रों का कहना है कि अभी लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं सो ‘गीता-सार’ को हटाने या समाप्त करने की कोई भी कोशिश अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने सरीखा साबित हो सकती है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मध्यप्रदेश की 29 सीटों में से तीन सीटें मिली थीं और कांग्रेस की कोशिश अपने सीटों के आंकड़े को इस बार 15 तक पहुंचाने की है.

 

source by FP

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